#जब_महाराजा_सूरजमल_ने _मीर#बख्शी_सलाबत_जंग_को #धूल_चटाई

 #जब_महाराजा_सूरजमल_ने _मीर#बख्शी_सलाबत_जंग_को #धूल_चटाई

ये घटना 1749 ईस्वी की है, जून के महीने में जोधपुर के महाराजा अभयसिंह की मृत्यु के बाद राज्य पर अधिकार के लिए उनके पुत्र रामसिंह और भाई बख्तसिंह के बीच उत्तराधिकार की जंग शुरू हो गई। मुग़ल बादशाह अहमदशाह ने बख्तसिंह का पक्ष लिया और उसकी सहायता के लिए मीर बख्शी सलाबत जंग को 18 हजार सैनिकों के साथ बख्तसिंह की सहायता के लिए रवाना किया। मीर बख्शी ने निश्चय किया कि लगे हाथ जाटों पर धावा बोलकर आगरा और मथुरा के उन इलाकों को उनसे छीन लिया जाए जो हाल ही में जाटों ने कब्जा लिए थे। मीर बख्शी ने जाटों के अधिकार वाले नीमराना दुर्ग पर कब्ज़ा कर लिया। महाराजा सूरजमल ने अपने दूत को वार्ता के लिए भेजा पर मीर बख्शी ने इस दूत से वार्ता भी नहीं की। इसके बाद मीर बख्शी सराय सोमाचन्द पहुंचा जहां महाराजा सूरजमल ने छह हजार सवार लेकर उसे घेर लिया। मीर बख्शी ने दिल्ली से सहायता मंगाई लेकिन जाटों ने उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया। इस स्थान पर भयानक लड़ाई हुई और मुग़ल सेनापति अली रुस्तम खां और हाकिम खां भी लड़ाई में मारे गए। 

विवश होकर मीर बख्शी ने सन्धि का प्रस्ताव भिजवाया जिसे महाराजा सूरजमल ने स्वीकार कर लिया। इस संधि की शर्तें इस प्रकार थीं

1. बादशाह की सरकार पीपल के वृक्षों को न कटवाने का वचन देती है।

2. बादशाह की सरकार पीपल वृक्षों की पूजा में कोई बाधा नहीं डालेगी।

3. बादशाह की सरकार ब्रज के हिन्दू मंदिरों का अपमान या नुकसान नहीं करेगी।

4. महाराजा सूरजमल अजमेर प्रान्त की मालगुजारी के रूप में राजपूतों से 15 लाख रुपये लेकर शाही खजाने में दे देगा।

5. मीर बख्शी नारनौल से आगे नहीं बढ़ेगा।

ईस सफलता से महाराजा सूरजमल तथा उसके आदमियों में नया आत्मविश्वास पैदा हुआ। जाटों की सैनिक शक्ति प्रमाणित हो गई। इस संधि की शर्तों में स्पष्ट रूप से ब्रजमंडल में भरतपुर के शासकों की उत्कृष्ट स्थिति को मान्यता दे दी गई।

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