भारतीय मौलिकता का महत्व साउथ सिनेमा से सीखे
वर्ष 2011में संजय लीला भंसाली ने कहा था कि फिल्म उद्योग में आ रही नई लहर स्वागत योग्य है हम कही अपने मेलोड्रामा , नाच गाने , क्लासिकल साहित्य आदि को भूल न जाए।
वर्ष 1969 की फिल्म प्रिंस में नित्य के एक मुकाबले का दृश्य जो वैजन्ती माला और हेलेन पर फिल्माया गया था, बैजन्ती एक भारतीय राजकुमारी के भूमिका में थी हेलेन अंग्रेज युवक के रोल में ।
वैजन्ती ने भारतीय नृत्य की प्रस्तुति दी भारत नाट्ययम से कथक तक जबकि हेलेन ने फ्लामेको से beli डांस तक का मुजाहिरा किया ।
यह पूरब बनाम पश्चिम की टक्कर थी और दोनो के बीच शम्मी कपूर फ्री स्टाइल शैली में नाच रहे थे । फिल्म की पृष्ठभूमि एक राष्टीय कथानक पर आधारित थी । जिसमे ब्रिटिशों के प्रति वफादार एक रियासत को आजादी के बाद सरदार पटेल के नेतृत्व में भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना था ।
यह 2023 हे लेकिन आज भी राष्टीय गौरव के तर्क के रूप में नाच गाना को प्रस्तुत कर रहे हे और साम्राज्यवादी पूर्व ग्रहों का प्रतिकार कर रहे , बात फिल्म आर आर आर की जिसमे
कोमूराम भीम और अल्लू सीताराम राजू को देशी मुकाबले में नृत्य करते हुए दिखाया गया है उनकी कला एक फिरंगी महिला का दिल जीत लेती हे , मुकाबले से ठीक पहले भीम और राम का यह कहकर अपमान किया गया की उनमें आर्ट समझ नही हे।
इससे जलसे में मौजूद अश्वेत ड्रमर्स और भारतीय सेवकों को बुरा लगता है । लेकिन जब नाच शुरू होता है तो बाजी उलट जाती है जब नाटु नाटू गाने ने सर्वश्रेष्ठ गीत के रूप में अमेरिका का गोल्डन ग्लोब पुरस्कार जीता तो इसमें एक काव्य न्याय ही निहित था । दशकों से नाच गाने ही भारतीय सिनेमा की पहचान रहे हैं और नाटु नाटु को मिले पुरस्कार से यह सिद्ध होता है कि हमें जो अच्छी तरह से करना आता है उसी में हाथ साधते रहना चाहिए ।
2009 में आई स्लमडॉग मिलेनियर को मिली अंतरराष्ट्रीय सफलता में उसके प्रसिद्ध गीत जय हो का भी योगदान था , छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर डांस करते हुए देव पटेल और फ्रीडा पिंटो पर फिल्माया गया था । अतीत में यही विक्टोरिया टर्मिनस कहलाता था , जब देव पटेल फ्रीडा पिंटो को देखते थे वे ब्रिटिश आर्किटेक्चरल इंजीनियर फ्रेडरिक विलियम स्टीवेंस की मूर्ति के पैरों में बैठे होते है।
जिन्होंने इस टर्मिनस को डिजाइन किया था यह 1987 में बनकर पूर्ण हुआ था , क्वीन विक्टोरिया के राज की 50 वीं वर्षगांठ के अवसर पर हाल ही में फिल्म गंगूबाई काठियावाड़ी को भी जो ध्यानाकर्षण मिला है इस बात का प्रमाण है कि नाच गाना भारतीय सिनेमा का प्राणतत्व है ।
2002 के कांस फिल्म फेस्टिवल में इसी तरह से देवदास ने सबका ध्यान खींचा था और ऐश्वर्या राय को अंतराष्टीय फिल्म समारोह में ख्याति मिली थी ।
फिल्म का गीत डोला रे बहुत प्रसिद्ध हुआ , भारतीय फिल्मों के नित्य गीत इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि उनमें अनेक लोकप्रिय धाराओं का समावेश हुआ है ।
भारतीय लोक और शास्त्रीय नृत्य रूपों के साथ ही हमारे फिल्मों में वोल्टेज चाचाचा ट्विस्ट स्विंग डिस्को जैज हिप हॉप सालसा बैली डांसिंग यानी हर तरह के डांस मूव मिल जाएगा ।
ऐसा लगता है कि हाल के सालों में हिंदी सिनेमा अपनी यह डगर भूल गया है
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